Wednesday, April 20, 2011

जिनवाणी स्तुति


मिथ्यातम नासवे को, ज्ञान के प्रकासवे को,
आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है ।
छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध-विधि भानवे को,
स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ॥
अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को,
काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है ।
जहाँ-तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को,
सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है ॥
हे जिनवाणी भारती, तोहि जपों दिन रैन,
जो तेरी शरणा गहै, सो पावे सुख चैन ।
जा वाणी के ज्ञान तें, सूझे लोकालोक,
सो वाणी मस्तक नवों, सदा देत हों ढोक ॥



देव शाश्त्र गुरु पूजन

केवल रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अंतर
उस श्री जिनवाणी में होता, तत्त्वों का सुंदरतम दर्शन


सद्दर्शन बोध चरण पथ पर, अविरल जो बड़ते हैं मुनि गण
उन देव परम आगम गुरु को , शत शत वंदन शत शत वंदन


इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यामयी कंचन काया
यह सब कुछ जड़ की क्रीडा है , मैं अब तक जान नहीं पाया


मैं भूल स्वयं के वैभव को , पर ममता में अटकाया हूँ
अब निर्मल सम्यक नीर लिए , मिथ्या मल धोने आया हूँ


जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु, अपने अपने में होती है
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृत्ति है


प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित, होकर संसार बड़ाया है
संतप्त हृदय प्रभु चंदन सम, शीतलता पाने आया है


उज्ज्वल हूँ कंठ धवल हूँ प्रभु, पर से न लगा हूँ किंचित भी
फिर भी अनुकूल लगें उन पर, करता अभिमान निरंतर ही


जड़ पर झुक झुक जाता चेतन, की मार्दव की खंडित काया
निज शाश्वत अक्षत निधि पाने, अब दास चरण रज में आया


यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन में माया कुछ शेष नही
निज अंतर का प्रभु भेद काहूँ, औस में ऋजुता का लेश नही


चिन्तन कुछ फिर संभाषण कुछ, वृत्ति कुछ की कुछ होती है
स्थिरता निज में प्रभु पाऊं जो, अंतर का कालुश धोती है


अब तक अगणित जड़ द्रव्यों से, प्रभु भूख न मेरी शांत हुई
तृष्णा की खाई खूब भारी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही


युग युग से इच्छा सागर में, प्रभु ! गोते खाता आया हूँ
चरणों में व्यंजन अर्पित कर, अनुपम रस पीने आया हूँ


मेरे चैत्यन्य सदन में प्रभु! चिर व्याप्त भयंकर अँधियारा
श्रुत दीप बूझा है करुनानिधि, बीती नही कष्टों की कारा


अतएव प्रभो! यह ज्ञान प्रतीक, समर्पित करने आया हूँ
तेरी अंतर लौ से निज अंतर, दीप जलाने आया हूँ।


जड़ कर्म घुमाता है मुझको, यह मिथ्या भ्रांति रही मेरी
में रागी द्वेषी हो लेता, जब परिणति होती है जड़ की


यों भाव करम या भाव मरण, सदिओं से करता आया हूँ
निज अनुपम गंध अनल से प्रभु, पर गंध जलाने आया हूँ


जग में जिसको निज कहता में, वह छोड मुझे चल देता है
में आकुल व्याकुल हो लेता, व्याकुल का फल व्याकुलता है


में शांत निराकुल चेतन हूँ, है मुक्तिरमा सहचर मेरी
यह मोह तड़क कर टूट पड़े, प्रभु सार्थक फल पूजा तेरी


क्षण भर निज रस को पी चेतन, मिथ्यमल को धो देता है
कशायिक भाव विनष्ट किये, निज आनन्द अमृत पीता है


अनुपम सुख तब विलसित होता, केवल रवि जगमग करता है

दर्शन बल पूर्ण प्रगट होता, यह है अर्हन्त अवस्था है

यह अर्घ्य समर्पण करके प्रभु, निज गुण का अर्घ्य बनाऊंगा
और निश्चित तेरे सदृश प्रभु, अर्हन्त अवस्था पाउंगा



- श्री जुगल किशोर जी "युगल"


  

उत्तम आर्जव


मन में होय सो वचन उचरिये
वचन होय सो तन सो करिए !


Tuesday, April 19, 2011

मिल जाये मुझे निजधाम


लुट लुट जाऊं तुम चरणॊं में, कब दिन ऐसा आयेगा
मिट मिट जाऊं तुम चरणो में, तब गजब हो जायेगा

मैने तुमको पूजा हमेशा, क्योंकि तुम ज्ञानी विरागी हो
तुमने दिखाया मैं भी विरागी, अब कैसे ये राग रह पायेगा

जाननहार अस्तित्व मेरा, कभी समझ ना पाया था
कोई ना मेरा, कोई ना किसी का, यह राज ना जान पाया था

सब द्रव्य से निराला था मैं , ऐसा कभी ना माना था
खुद को रूपी, रागी मानकर, अनन्त काल बिताया था

अब तो नाम लिया है तेरा, वीरागी बनना मेरा निश्चित है
निश्चित है मुक्ति, निश्चित है मोक्ष, अनन्त सुख भी निश्चित है

धुन लगाऊं तेरे गुण की, तो कैसे ना मुक्ति पाऊंगा
समस्त पुदगल, समस्त राग, छोङकर निज पद जाऊंगा

राह दिखाई तुने ऐसी, जिसमें कोई कंकङ ना हो
सुख सागर में डुबकि लगाने, कि अब कोई कसर ना हो

मिटा दूंगा सारा अज्ञान मैं, अब नाम लिया मैने तेरा
राग को छोङू, द्वेष को तोङूं, निजधाम है बस मेरा

तात्विक जगत का नक्शा दिखाया, ऐसा तेरा ज्ञान महान
बलि बलि जाऊं तुझ चरणों पर, मिल जाये मुझे निजधाम

- सहजानंद वरनी जी 

गलतियाँ


एक चित्रकार ने सड़क के किनारे चित्र रख दिया और नीचे लिखा -
इसमें यदि कोई त्रुटि दिखे तो उसे बताऐं ।
शाम को चित्र पर इतनी बड़ी  list बन गयी कि चित्र ही नहीं दिख रहा था।
अगले दिन उसने फिर चित्र रखा और नीचे लिखा त्रुटियों को सुधार दें।
शाम तक 1 भी सुधार नहीं हुआ।
हम सबकी गलतियाँ तो बताते हैं, उन्हें सुधारना नहीं चाहते।

सोना


सोना जलता नहीं, अशुद्धि ही जलती है,
पर अशुद्धि के सम्पर्क में आकर सोने को भी तपना पड़ता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

Saturday, March 5, 2011

मैं एक हूँ बस एक जग में

मैं एक हूँ बस एक जग में , हें अनेकों अन्य जन
छोड़ निज,पर में रमे क्यों , क्यों डोलता तेरा ये मन





Parmatm Prakash Bharill