Saturday, September 12, 2015
Sunday, April 12, 2015
गलती
गलती स्वीकार करने में कभी देर नहीं करनी चाहिए
सफर जितना लम्बा होगा वापिसी उतनी ही मुश्किल होगी ।।
सफर जितना लम्बा होगा वापिसी उतनी ही मुश्किल होगी ।।
मेरे जीवन का जब अंत हो
मेरे जीवन का जब अंत हो
मेरे सामने एक् सन्त हो
मेरे होठो पर अरिहंत हो
और महावीर पंथ हो
तन में जब तक साँस हो
मन में एक विश्वास हो
मुक्ति की मुझे प्यास हो
पंडित मरण की आस हो
तन अचल और मन अचल हो
और कोई विघ्न न हो
कषायों की आग में जलता जलता आया
वासना की आग मे जलता जलता आया
दुःख भरी इस जीवन यात्रा का अब सुखद अंत हो
मेरे जीवन का जब अंत हो
मेरे सामने एक संत हो
मेरे सामने एक् सन्त हो
मेरे होठो पर अरिहंत हो
और महावीर पंथ हो
तन में जब तक साँस हो
मन में एक विश्वास हो
मुक्ति की मुझे प्यास हो
पंडित मरण की आस हो
तन अचल और मन अचल हो
और कोई विघ्न न हो
कषायों की आग में जलता जलता आया
वासना की आग मे जलता जलता आया
दुःख भरी इस जीवन यात्रा का अब सुखद अंत हो
मेरे जीवन का जब अंत हो
मेरे सामने एक संत हो
Friday, October 26, 2012
मेरी भावना
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया
सब जीवोको मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया
बुध्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रम्हा, या उसको स्वाधीन कहो
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ||1||
विषयो की आशा नहि जिनके साम्य भाव धन रखते हैं
निज परके हित-साधन में जो निश दिन तत्पर रहते हैं
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं
ऐसे ज्ञानी साधू जगत के दुःख समूह को हारते हैं ||2||
रहे सदा सत्संग उन्ही का ध्यान उन्ही का नित्य रहे हैं
उन्ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे हैं
नहीं सताऊ किसी जीव को झूठ कभी नहीं कहा करू
परधन वनिता पर न लुभाऊ, संतोशामृत पीया करू ||3||
अहंकार का भाव न रखु नहीं किसी पर क्रोध करू
देख दुसरो की बढती को कभी न इर्ष्या भाव धरु
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यव्हार करू
बने जहा तक जीवन में, औरो का उपकार करू||4||
मंत्री भाव जगत में मेरा सब जीवो से नित्य रहे
दींन दुखी जीवो पर मेरे उर से करुना – स्रोत बहे
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतो पर क्षोभ नहीं मुझको आवे
साम्यभाव रखु में उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ||5||
गुनी जनों को देख ह्रदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे
बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे
होऊ नहीं क्रुत्ग्न कभी में द्रोह न मेरे उर आवे
गुण ग्रहण का भाव रहे नित दृस्थी न दोषों पर जावे ||6||
कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आवे या जावे
अनेक वर्षो तक जीउ या मृत्यु आज ही आ जावे
अथवा कोई ऐसा ही भय या लालच देने आवे
तो भी न्याय मार्ग से मेरा कभी न पद डिगने पावे ||7||
होकर सुख में मग्न न दुले दुःख में कभी न घबरावे
पर्वत नदी श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे
रहे अडोल अकंप निरंतर यह मन दृद्तर बन जावे
इस्ट वियोग अनिस्ठ योग में सहन- शीलता दिखलावे ||8||
सुखी रहे सब जीव जगत के कोई कभी न घबरावे
बैर पाप अभिमान छोड़ जग नित्य नए मंगल गावे
घर घर चर्चा रहे धर्मं की दुष्कृत दुस्खर हो जावे
ज्ञान चरित उन्नत कर अपना मनुज जन्म फल सब पावे ||9||
इति भीती व्यापे नहीं जग में वृस्ती समय पर हुआ करे
धर्मनिस्ट होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे
रोग मरी दुर्भिक्स न फैले प्रजा शांति से जिया करे
परम अहिंसा धर्म जगत में फ़ैल सर्व हित किया करे ||10||
फैले प्रेम परस्पर जगत में मोह दूर हो राह करे
अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहीं कोई मुख से कहा करे
बनकर सब “युगवीर” ह्रदय से देशोंनती रत रहा करें
वस्तु स्वरुप विचार खुशी से सब संकट सहा करे ||11||
मंगलाचरण
चत्तारी मंगलं-अर्हंत मंगलं ,
सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं,
केवली पण्णत्तो धम्मो मंगलं
चत्तारी लोगुत्तमा-अर्हंता लोगुत्तमा.
सिद्ध लोगुत्तमा ,
साहू लोगुत्तमा ,
केवली पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा
चत्तारी सरणं पवज्जामि – अर्हंत सरणं पवज्जामि ,
सिद्ध सरणं पवज्जामि ,
साहू सरणं पवज्जामि
केवली पण्णत्तो धम्मो सरणं पवज्जामि
सिद्ध मंगलं, साहू मंगलं,
केवली पण्णत्तो धम्मो मंगलं
चत्तारी लोगुत्तमा-अर्हंता लोगुत्तमा.
सिद्ध लोगुत्तमा ,
साहू लोगुत्तमा ,
केवली पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा
चत्तारी सरणं पवज्जामि – अर्हंत सरणं पवज्जामि ,
सिद्ध सरणं पवज्जामि ,
साहू सरणं पवज्जामि
केवली पण्णत्तो धम्मो सरणं पवज्जामि
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